उत्तराखंड की पवित्र देवभूमि अपने प्राचीन मंदिरों, प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक वातावरण के लिए पूरे भारत में प्रसिद्ध है। इन्ही दिव्य स्थलों में से एक प्रमुख नाम है सुरकंडा देवी मंदिर। यह मंदिर टिहरी गढ़वाल जिले में सुरकुट पर्वत पर स्थित है और माँ दुर्गा के शक्तिपीठों में विशेष स्थान रखता है। समुद्र तल से लगभग 2750 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह मंदिर हिमालय की गोद में बसा हुआ है।
माना जाता है कि इस स्थान पर माता सती का सिर गिरा था। सिर को स्थानीय भाषा में सुर कहा जाता है, इसलिए इस स्थान का नाम सरकुंडा पड़ा।
मंदिर की वास्तुकला और स्वरूप
सुरकंडा देवी मंदिर का निर्माण पारंपरिक पहाड़ी शैली में किया गया है। मंदिर का शिखर दूर से ही भक्तों को आकर्षित करता है। गर्भगृह में माँ सुरकंडा देवी की पवित्र प्रतिमा स्थापित है, जहाँ भक्त श्रद्धा और भक्ति के साथ पूजा अर्चना करते हैं। मंदिर के चारों ओर रंग- बिरंगे ध्वज, घंटियाँ और पूजा सामग्री इसकी धार्मिक गरिमा को और भी बढ़ाते हैं।
मंदिर तक पहुँचने के लिए भक्तों को क़द्दूख़ाल से लगभग दो किलोमीटर की चढ़ाई करनी पड़ती है।
अनोखा प्रसाद
ज़्यादातर मंदिरों में प्रसाद के तौर में मिलता है लड्डू, पेड़ा या मिश्री लेकिन सुरकंडा देवी मंदिर में भक्तों को प्रसाद के रूप में रौंसली की पत्तियाँ दी जाती हैं। स्थानीय लोग इन पत्तियों के पेड़ को देववृक्ष मानते हैं।
गंगा दशहरा और धार्मिक उत्सव
सुरकंडा देवी मंदिर में गंगा दशहरा का पर्व विशेष उत्साह और भक्ति से मनाया जाता है। इस अवसर पर विशाल मेले का आयोजन होता है और दूर-दूर से श्रद्धालु शामिल होते हैं। भक्तजन माँ के जयकारों के साथ मंदिर तक यात्रा करते हैं और विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।
