हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले की करसोग घाटी में ऊँचे पहाड़ों के बीच स्थित कमरूनाग मंदिर एक ऐसा पवित्र स्थल है, जहाँ आस्था, प्रकृति और पौराणिक इतिहास एक साथ मिलते हैं। यहां विराजमान हैं बड़ा देव कमरूनाग, जिन्हें वर्षा का देवता और न्याय का देवता माना जाता है।
भारत की धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कई ऐसी कथाएं मिलती हैं, जहाँ एक ही पात्र को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रूपों में पूजा जाता है।
बर्बरीक और कमरुनाग की कथा भी ऐसे ही एक लोककथा से जुड़ी हुई है।
बर्बरीक महाभारत काल के एक महान योद्धा थे। वे भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र माने जाते थे।
उनके पास तीन दिव्य बाण थे। उन्हें तीन बाणधारी भी कहा जाता है। उन्होंने वचन दिया था कि वे हमेशा कमजोर पक्ष का साथ देंगे।
जब श्रीकृष्ण जी को यह ज्ञात हुआ कि बर्बरीक युद्ध में भाग लेंगे, तो उन्होंने ब्राह्मण वेश में उनकी परीक्षा ली ।
उन्होंने बर्बरीक से दान में उनका सिर माँग लिया और बर्बरीक ने बिना संकोच किए अपना शीश दान कर दिया। उन्होंने केवल युद्ध देखने की इच्छा प्रकट की और श्री कृष्ण ने उनका सिर एक ऊँचे स्थान पर रख दिया, जहाँ से उन्होंने पूरा युद्ध देखा।
कमरुनाग मंदिर की सबसे अनोखी बात यह है कि यहाँ एक पवित्र झील है, जिसमें भक्त सोना-चाँदी और पैसे चढ़ाते हैं।
हैरानी की बात यह है कि इस झील में करोड़ों का खजाना मौजूद माना जाता है।
लेकिन कोई भी इसे निकालने की हिम्मत नहीं करता मान्यता है कि ऐसा करने पर भारी अनिष्ट हो सकता है।
कमरुनाग मंदिर के परिसर में हर साल आषाढ़ महीने (जून) में साजा मेला आयोजित होता है। हजारों श्रद्धालु यहाँ दूर-दूर से पहुँचते हैं। देवता की विशेष पूजा और अनुष्ठान किए जाते हैं काफ़ी भक्त झील में सोना, चाँदी और धन चढ़ाते हैं।
