गोपेश्वर महादेव मंदिर उत्तराखंड के चमोली जिले के गोपेश्वर में समुंद्र तल से 1300 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है।
सकंद पुराण के अनुसार, गोपेश्वर क्षेत्र अत्यंत पवित्र तपस्थली माना जाता है। इसी स्थान पर भगवान शिव माँ पार्वती के साथ पशुपीश्वर के रूप में नित्य निवास करते हैं।
16 फीट ऊँचा रहस्यमयी त्रिशूल
मंदिर परिसर में स्थापित लगभग 5 मीटर ऊँचा विशाल त्रिशूल गोपेश्वर महादेव की सबसे बड़ी पहचान माना जाता है। माना जाता है कि यह त्रिशूल अष्टधातु से निर्मित है।
कहा जाता है कि जब कामदेव ने भगवान शिव की गहन तपस्या भंग करने का प्रयास किया, तब शिवजी ने क्रोधित होकर इसी त्रिशूल को कामदेव की ओर फेंका था। भगवान शिव के तीसरे नेत्र की अग्नि से कामदेव भस्म हो गए।
स्थानीय लोगों की मान्यता है कि यह त्रिशूल सामान्य बल से हिलाया नहीं जा सकता, लेकिन यदि कोई सच्चा भक्त श्रद्धा से इसे स्पर्श करे तो इसमें कंपन महसूस होता है। यही कारण है कि यह त्रिशूल आज भी श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए रहस्य और आस्था का केंद्र बना हुआ है।
रति की तपस्या से जुड़ी है रतीश्वर की कथा
कामदेव के भस्म होने के बाद उनकी पत्नी रति ने इसी स्थान पर स्थित एक पवित्र कुंड के निकट कठोर तपस्या की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने वरदान दिया कि कामदेव श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युमन के रूप में पुनर्जन्म लेंगे और पुनः उनका मिलन होगा।
जिस स्थान पर रति ने तप किया, वह रतिकुंड कहलाया,जिसे आज वैतरणी कुंड के नाम से भी जाना जाता है।
9वीं से 11वीं शताब्दी की कत्यूरी शैली में बना मंदिर
गोपेश्वर महादेव मंदिर की वास्तुकला उत्तराखंड की प्राचीन कत्यूरी शैली का सुंदर उदाहरण मानी जाती है। पत्थरों से बने इस मंदिर की दीवारों और शिखर पर की गई नक्काशी प्राचीन भारतीय कला की भव्यता को दर्शाती है।
रुद्रनाथ की शीतकालीन गद्दी के रूप में भी प्रसिद्ध
गोपेश्वर मंदिर का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह पंच केदार में शामिल रुद्रनाथ मंदिर की शीतकालीन गद्दी माना जाता है। सर्दियों के मौसम में जब रुद्रनाथ मंदिर बर्फ से ढक जाता है, तब वहाँ की पूजा- अर्चना की परंपरा गोपेश्वर में निभाई जाती है।
इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन करने पहुचंते हैं और भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
