भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित यमुनोत्री मन्दिर हिंदू धर्म के सबसे पवित्र तीर्थस्थलों में से एक माना जाता है। यह मंदिर चार धाम यात्रा का पहला पड़ाव है और माँ यमुना को समर्पित है।
यमुनोत्री मंदिर का इतिहास
यमुनोत्री मंदिर का इतिहास बहुत ही प्राचीन और ऐतिहासिक है। मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण गढ़वाल नरेश प्रताप शाह ने करवाया था। बाद में कई बार प्राकृतिक आपदाओं के कारण मंदिर को नुकसान पहुँचा, जिसके बाद पुनःनिर्माण करवाया गया।
हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार माँ यमुना सूर्या देव और संज्ञा की पुत्री तथा यमराज की बहन हैं।
मंदिर की पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ऋषि असित मुनि यही तपस्या करते थे। वे प्रतिदिन गंगा और यमुना दोनों में स्नान करते थे लेकिन जब वृद्धावस्था के कारण वे गंगोत्री नहीं जा सके, तब माँ गंगा स्वयं यमुनोत्री में प्रकट हुई ताकि ऋषि को दोनों नदियों का आशीर्वाद मिल सके।
मंदिर की वास्तुकला
यमुनोत्री मंदिर की वास्तुकला बेहद आकर्षक और पारंपरिक पहाड़ी शैली में बनी है। मंदिर का रंग-बिरंगा शिखर दूर से ही श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित करता है। मंदिर के गर्भगृह में माँ यमुना की काले पत्थर से बनी दिव्य मूर्ति स्थापित है। साथ ही माँ गंगा की प्रतिमा भी यहाँ विराजमान है।
सूर्यकुंड और दिव्यशिला
यमुनोत्री के पास स्थित सूर्यकुंड अत्यंत प्रसिद्ध गर्म जल स्रोत है। इस कुंड का पानी इतना गर्म होता है कि श्रद्धालु इसमें चवाल और आलू बांधकर पकाते हैं और उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।
मंदिर में प्रवेश करने से पहले श्रद्धालु दिव्य शिला के दर्शन करते हैं। यह एक दिव्य शिला मानी जाती है और इसकी पूजा के बाद ही भक्त यमुना नदी के दर्शन करते हैं।
यमुनोत्री यात्रा का मार्ग
यमुनोत्री धाम पहुँचने के लिए श्रद्धालुओं को कठिन पहाड़ी यात्रा करनी पड़ती है। सड़क मार्ग से अंतिम पड़ाव जानकीचट्टी तक ही वाहन जाते हैं। इसके बाद लगभग 5-6 किलोमीटर की पैदल यात्रा करनी होती है।
यात्रा का समय
यमुनोत्री मंदिर के कपाट हर वर्ष अक्षय तृतीया के अवसर पर खुलते हैं और दीपावली के बाद बंद हो जाते हैं। मई से जून और सितंबर से अक्टूबर तक यात्रा का समय बेहतर रहता है। बरसात के मौसम में यहां भूस्खलन का खतरा रहता है, इसलिए सावधानी पूर्वक ही जाना चाहिए।
