भारत की पवित्र नदियों में गंगा का स्थान सबसे ऊँचा माना जाता है। यह मंदिर समुद्र तल से लगभग 3,100 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है और चारधाम यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
मंदिर का धार्मिक महत्त्व
हिंदू धर्म में गंगा नदी को केवल एक नदी नहीं बल्कि देवी का स्वरूप माना गया है। मान्यता है कि राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर माँ गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर आने को तैयार हुईं। लेकिन गंगा के तीव्र वेग को संभालना संभव नहीं था, इसलिए भगवान शिव ने अपनी जटाओं में गंगा को धारण किया और फिर धीरे-धीरे पृथ्वी पर प्रभावित किया।
इसी पौराणिक घटना से जुड़ा यह पवित्र स्थल गंगोत्री कहलाता है। माना जाता है कि यहां माँ गंगा पहली बार पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं। इसलिए यह स्थान हिंदुओं के लिए अत्यंत पवित्र और मोक्षदायी माना जाता है।
इतिहास
गंगोत्री मंदिर का निर्माण 18वीं शताब्दी में गोरखा सेनापति अमर सिंह थापा द्वारा करवाया गया था। बाद में जयपुर के राजघराने ने इसका पुननिर्माण करवाया। सफेद ग्रेनाइट पत्थरों से बना यह मंदिर हिमालय की बर्फीली चोटियों के बीच अत्यन्त सुंदर दिखाई देता है।
मंदिर की वास्तुकला सरल लेकिन आकर्षक है। मंदिर के गर्भगृह में माँ गंगा की चाँदी से निर्मित प्रतिमा स्थापित है।
गंगोत्री मंदिर उत्तराखंड की प्रसिद्ध चारधाम यात्रा का दूसरा धाम माना जाता है। यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ- ये चारों धाम हिंदू धर्म में अत्यधिक पवित्र माना जाता है।
मंदिर के कपाट कब खुलते हैं?
गंगोत्री मंदिर के कपाट हर वर्ष अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर खोले जाते हैं और दीपावली के बाद भाई दूज पर बंद कर दिए जाते हैं। सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण मंदिर क्षेत्र पूरी तरह से बर्फ से ढक जाता है।
कपाट बंद होने के बाद माँ गंगा की पूजा मुखबा गांव में की जाती है।
आसपास के प्रमुख दर्शनीय स्थल
गौमुख, गंगोत्री से लगभग 18 किलोमीटर दूर स्थित गौमुख ग्लेशियर गंगा का वास्तविक उद्गम स्थल माना जाता है। यहां पर आप भैरों घाटी और पांडव गुफा के दर्शन भी कर सकते हैं।
कैसे पहुंचे गंगोत्री?
गंगोत्री पहुँचने के लिए सबसे निकटतम हवाई अड्डा जॉली ग्रांट एयरपोर्ट, देहरादून है। निकटतम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश और देहरादून हैं। वहाँ से सड़क मार्ग द्वारा उत्तरकाशी होते हुए गंगोत्री पहुंचा जा सकता है।
