माता बगलामुखी हिंदू धर्म की दशमहाविद्याओं में से एक अत्यंत शक्तिशाली देवी मानी जाती हैं। उन्हें विशेष रूप से शत्रुओं का नाश करने वाली, वाणी पर नियंत्रण देने वाली और न्याय पर विजय दिलाने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। माँ की साधना तंत्र और शक्ति उपासना में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती है।
प्रसिद्ध शक्तिपीठ
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िले में स्थित बगलामुखी मन्दिर, बनखंडी बेहद पवित्र स्थान है। यहाँ दूर-दूर से श्रद्धालु अपनी मनोकामनाए लेकर आते हैं और विशेष रूप से हल्दी की माला, पीले वस्त्र और हवन के माध्यम से पूजा करते हैं।
माँ बगलामुखी का स्वरूप और महत्व
माँ का स्वरूप अत्यंत दिव्य और प्रभावशाली माना जाता है। उनका वर्ण पीला बताया गया है, इसलिए उनकी पूजा में पीले वस्त्र, पीले पुष्प और हल्दी का विशेष महत्व होता है। वे एक हाथ से शत्रु की जीभ पकड़कर दूसरे हाथ से उसे पराजित करते हुए दिखाई जाती हैं। यह स्वरूप प्रतीक है कि वे नकारात्मक शक्तियों, शत्रुओं और बाधाओं को तुरंत नियंत्रित कर सकती हैं।
दशमहाविद्याओं में माँ बगलामुखी का स्थान
दस महाविद्याएं आदि शक्ति माता पार्वती के दस उग्र और सौम्य तांत्रिक रूप हैं, जो ज्ञान, शक्ति और चेतना के विभिन्न पहलुओं का प्रतिनिधित्व करती हैं।
दस महाविद्याओं का विवरण
माँ काली: समय और मृत्यु की देवी
माँ तारा: तारने वाली या मोक्ष प्रदान करने वाली
माँ त्रिपूर सुन्दरी: सुंदरता और सुख की देवी
माँ भुवनेश्वरी: ब्रह्मांड की स्वामिनी
माँ छिन्नमस्ता: आत्म- साक्षात्कार के लिए अपना सिर काटने वाली देवी
माँ त्रिपूर भैरवी: विनाश और विनाशकारी शक्ति
माँ धूमावती: विधवा देवी, जो दुख और अभाव की शक्ति हैं।
माँ बगलामुखी: शत्रुओं को स्तंभित करने वाली देवी
माँ मातंगी: ज्ञान, कला एवं विद्या की देवी
माँ कमला: समृद्धि और धन की देवी
इन्हें दस तांत्रिक देवियाँ, शक्ति के दस गुप्त रूपों के नाम से भी जाना जाता है।
माँ बगलामुखी का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि उनकी उपासना विशेष रूप से उनके लिए फलदायी मानी जाती है जो:
न्याय संबंधी मामलों में सफलता प्राप्त करने की कामना करते हैं।
शत्रुओं से मुक्ति चाहते हैं।
वाणी में संयम और प्रभाव चाहते हैं।
मानसिक शक्ति और आत्मविश्वास को मजबूत बनाने की इच्छा रखते हैं ।
प्राचीन समय में एक बार सृष्टि पर भयंकर संकट आ गया। चारों ओर तेज प्रलयकारी तूफान चलने लगा, जिससे धरती, आकाश और पृथ्वी सब डगमगाने लगे। भयभीत देवता भगवान विष्णु के पास सहायता के लिए पहुँचे। तब भगवान विष्णु ने हरिद्रा सरोवर के किनारे कठोर तपस्या की।
उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर पीतवर्ण की दिव्य शक्ति माँ बगलामुखी प्रकट हुईं। माँ ने अपने अद्भुत तेज से उस विनाशकारी तूफ़ान को तुरंत रोक दिया और सृष्टि की रक्षा की।
कुछ समय बाद मदनासुर नामक दैत्य ने वरदान प्राप्त किया और अपनी वाणी से सबको परेशान करना शुरू कर दिया पुनः देवताओं ने माता की शरण ली। तब माँ बगलामुखी युद्धभूमि में आकर दैत्य की जीभ पकड़कर उसकी शक्ति को स्तंभित कर दिया। दैत्य ने क्षमा माँगी और माँ ने उसे जीवनदान दे दिया।
तभी से माँ बगलामुखी को स्तंभन शक्ति की देवी माना जाता है- जो भक्तों को शत्रुओं, भय और बाधाओं से रक्षा करती हैं।
