दिव्य शक्तिपीठ माता ज्वाला

ऐसा अद्भुत मंदिर जहाँ मूर्ति नहीं, बल्कि स्वयं प्रकट ज्योति के रूप में होती है माँ की पूजा- ऐसा दरबार जहाँ झुके सम्राट अकबर भी, जानिए दिव्य शक्तिपीठ माता ज्वाला का रहस्य।

भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक माता ज्वाला जी का मंदिर अपनी अनोखी चमत्कारी विशेषता के कारण पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। यह ऐसा दिव्य मंदिर है जहाँ मूर्ति नहीं, बल्कि धरती से प्रकट होने वाली नौ ज्योतिओं के रूप में माता की पूजा की जाती है। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िले के ज्वालामुखी में स्थित है माता का भव्य मंदिर।

बिना मूर्ति के पूजा- स्वयं प्रकट होती है ज्योतियाँ:

भारत के अधिकांश मंदिरों में देवी-देवताओं की प्रतिमा स्थापित होती है, लेकिन माँ ज्वाला जी के मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है की यहाँ कोई प्रतिमा नहीं है। यहाँ धरती के गर्भ से निकलने वाली निरंतर जलती दिव्य ज्वालाएँ ही माता का स्वरूप मानी जाती हैं।

इन ज्योतियों को माता के नौ रूपों का प्रतीक माना जाता है:

महाकाली

अन्नपूर्णा

चण्डी

हिंगलाज

विंध्यवासिनी

महालक्ष्मी

सरस्वती

अम्बिका

अंजी देवी

इन ज्वालाओं का जलना बिना किसी तेल, घी या बाहरी ईंधन के निरंतर जारी रहना- इस मंदिर का सबसे बड़ा रहस्य और चमत्कार है।

शक्तिपीठ से जुड़ी पौराणिक मान्यता:

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब भगवान शिवा माता सती के शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे तो भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के टुकड़े किए। जहाँ-जहाँ उनके अंग गिरे वहाँ पर शक्तिपीठ बने।

मान्यता है की माता सती की जिह्वा यहाँ गिरी थी, इसलिए यहाँ ज्वाला के रूप में माता का प्रकट होना शक्ति का प्रतीक माना जाता है।

हजारों वर्षों से जल रही हैं दिव्य ज्योतियाँ:

माता ज्वाला जी की मंदिर की ज्योतियाँ सदियों से निरंतर जल रही हैं।

वैज्ञानिक भी इस रहस्य को पूरी तरह समझ नहीं पाए। इतिहास के कई शासकों ने इसे नष्ट करने की कोशिश की लेकिन वे सफल नहीं हुए। यह घटना श्रद्धालुओं के अटूट विश्वास को और मज़बूत करती है।

सम्राट अकबर भी झुके माता के चरणों में:

मुगल सम्राट अकबर ने भी माता ज्वाला जी की शक्ति की परीक्षा लेने का प्रयास किया था। कहा जाता है कि उन्होंने ज्योतियाँ बुझाने के कई तरीक़े अपनाए कभी लोहे के तख्त कभी पानी की लहरें पर कोई भी तरीका सफल नहीं हुआ।

अंत में अकबर स्वयं नंगे पांव माता के दरबार पहुँचे और सोने का छत्र चढ़ाया किंतु माता ने उनकी यह अहंकारी भेंट स्वीकार नहीं की और उस सोने के छत्र को विचित्र धातु में परिवर्तित कर दिया। आज भी वह छत्र मंदिर में मौज़ूद है।

भक्तों की मनोकामनाएं होती हैं पूर्ण:

माँ के दरबार में जो भी सच्चे मन से जाता है उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है। यहाँ नारियल, चुनरी और श्रद्धा के साथ की गई प्रथना विशेष फलदायी मानी जाती है।

नवरात्रि के समय यहाँ विशेष रूप से भारी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं और माता के जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है।

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