हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में काशावरी गाँव में, पार्वती और व्यास नदी के संगम के पास, लगभग 2460 मीटर ऊँचाई पर स्थित है।
नाम का रहस्य: हर 12 साल में एक बार बिजली सीधे मंदिर के शिवलिंग पर गिरती है। इस दौरान शिवलिंग पूरा टुकड़ो में बिखर जाता है, मंदिर के पुजारी पुनः शिवलिंग को मखन्न से जोड़ते हैं और शिवलिंग फिर से पहले जैसा हो जाता है । यह घटना भगवान शिव की उस शक्ति को दर्शाती है, जिससे वे प्राकृतिक आपदाओं को अपने ऊपर लेकर अपने भक्तों की रक्षा करते हैं।
यह मंदिर काठ-कुनी स्थाप्य शैली में बना है, जो पहाड़ी वास्तुकला की एक पारंपरिक शैली है। ऐसा माना जाता है की मंदिर का निर्माण पांडवों ने अपने वनवास के दौरान किया था। पहले मंदिर तक केवल चांसारी गाँव से ट्रैकिंग का रास्ता था जो की मंदिर से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर है। अब यहाँ पर पहुँचने के लिए आप कुल्लू वैली, पार्वती वैली और नागर से पहुँचा जा सकता है। अप्रैल से जून और सितंबर से नवंबर के महीने मंदिर दर्शन के लिए अच्छा समय है। इस दौरान मौसम का आनंद मंदिर के लिए जाने वाले पहाड़ी रास्ते पर आप आसानी से कर पाएंगे जो कि पहाड़ी रास्ता चढ़ने के लिए उपयुक्त होगा।
पौराणिक कथा:
कहा जाता है कुलंत नामक असुर जो की लाहौल स्पीति के मंथन गाँव से कुल्लू आया था। कुलंत ने एक विशालकाय सांप का रूप धारण करके सृष्टि के पूरे जीवन को जलमग्न करने का ठान लिया था लेकिन उसका वध करके भगवान शिव ने उसकी देह को पर्वत में बदल दिया और पूरी सृष्टि को नष्ट होने से बचा लिया।
