इस साल है बगैर रोहिणी नश्रत्र के मनाई जाएगी जन्माष्टमी – पंडित सोमेश्वर जोशी

ज्योतिर्विद पं. सोमेश्वर जोशी
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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर  इस साल भगवान श्रीकृष्ण का 5244 वां जन्मोत्सव मनाया जाएगा। ज्योतिर्विद पंडित सोमेश्वर जोशी के अनुसार 14 अगस्त की रात 7:45 मिनट पर अष्टमी तिथि शुरू होगी जो 15 अगस्त की शाम 5:39 तक रहेगी। रोहिणी नश्रत्र इस बार 16 अगस्त को पड़ रहा है।

पद्मपुराण-
उत्तराखंड श्रीकृष्णावतार की कथा में वर्णन मिलता है कि ‘‘दसवां महीना आने पर भादों मास की कृष्णा अष्टमी को आधी रात के समय श्री हरि का अवतार हुआ।’’

महाभारत –
खिलभाग हरिवंश- विष्णु पर्व – 4/17 के अनुसार जब भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हुए, उस समय अभिजित नामक मुहूत्र्त था, रोहिणी नक्षत्र का योग होने से अष्टमी की वह रात जयंती कहलाती थी और विजय नामक विशिष्ट मुहूत्र्त व्यतीत हो रहा था।’’

श्रीमद्भागवत-
10/3/1 के अनुसार भाद्रमास, कृष्ण पक्ष, अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और अर्द्ध रात्रि के समय पंडित सोमेश्वर जोशी भगवान् विष्णु माता देवकी के गर्भ से प्रकट हुए।

गर्ग संहिता गोलोकखंड-
11/22-24 के अनुसार ‘‘भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष, रोहिणी नक्षत्र, हर्षण-योग, अष्टमी तिथि, आधी रात के समय, चंद्रोदय काल, वृषभ लग्न में माता देवकी के गर्भ से साक्षात् श्री हरि प्रकट हुए।’’

ब्रह्मवैवर्त पुराण-
श्रीकृष्ण जन्मखंड-7 के अनुसार आधी रात के समय रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि के संयोग से जयंती नामक योग संपन्न हो गया था। जब अर्ध चंद्रमा का उदय हुआ तब भगवान श्रीकृष्ण दिव्य रूप धारण करके माता देवकी के हृदय कमल के कोश से प्रकट हो गए।

15 अगस्त की रात कृष्ण जन्म के समय न अष्टमी तिथि होगी न ही रोहिणी नश्रत्र इसलिए 14 को मनाये परन्तु सप्तमी विद्दा अष्टमी ग्राह्य न होने से 15 को जन्मास्टमी मनायी जाएगी।इस बार स्मार्त (सम्प्रदयिक आचार्यो से जिन्होंने दीक्षा न ली हो, जनसाधारण )14 को और वैष्णव सम्प्रदाय (सम्प्रदयिक आचार्यो से जिन्होंने दीक्षा ली हो ) वाले 15 अगस्त को  जन्माष्टमी व्रत रखेंगे।इसके साथ ही प्रदेश समेत प्रदेशभर में जन्माष्टमी की तैयारियां तेज हो गई हैं। इस बार भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव रोहिणी नश्रत्र में नहीं, बल्कि भरणी और कृतिका नश्रत्र के योग में मनाया जाएगा।

पंडित सोमेश्वर जोशी के अनुसार पांच साल बाद ऐसा योग बन रहा है। जब स्मार्त और वैष्णव जन बगैर रोहिणी नश्रत्र के जन्माष्टमी मनाएंगे।

 

कृष्ण जन्म रात्रि में ही क्यों?

वर्ष, माह, पक्ष, तिथि और रात्रि का मध्यमान होता हे भाद्रकृष्णपक्ष अष्टमी विशेष हे की महारात्रिया पूर्ण तिथियो में ही आती हे ऊपरोकत समय के मध्यमान का महत्व बताने में और कृष्ण मूल महत्वता बताने के लिए कृष्ण जन्म भाद्रकृष्ण पक्ष की अष्टमी को रात्रि अभिजीत में हुआ।

जन्माष्टमी को तंत्र की चार महारात्रियों मे से एक माना गया हे इन्ही योगो मे होने के कारणअति  शुभ एवं सिद्दी दायक होगी यह ऐसे योगहे जिसमे जन्म लेने की कारण सभी राक्षसो एवंकामदेव का रासलीला में अहंकार तोडा औरजन्म भी दिया विशेष रूप से इस रात्रि को शनि,राहु, केतु, भूत, प्रेत, वशीकरण, सम्मोहन, भक्तिऔर प्रेम के प्रयोग एवं उपाय करने से विशेषफल की प्राप्ति होगी मुहूर्त हेतु रात्रि अभिजीतमुहूर्त श्रेष्ठ रहेगा विशेष ज्योतिषीय जानकरी प्राप्त कर अनुष्ठान वैदिक विद्वान् पंडित से करवाने चाहिए।

 

यह विशेष उपाय करे:

  • संकल्प कर उपवास करे रात्रि में भी भोजन न ले
  • काले तिल व् सर्व ओषधि युक्त जल से स्नानकरे
  • संतान प्राप्ति तथा पारिवारिक आनंद बढ़ानेके लिए कृष्ण पूजन, अभिषेक, कर जन्म उत्सव मनाये
  • धनिये की पंजरी का भोग लगा कर प्रसादवितरण करे
  • इष्ट मूर्ति, मंत्र, यंत्र की विशेष पूजा व् साधना करे
  • श्री राधा कृष्ण बीजमंत्र का जप करे
  • भक्ति एवं संतान प्राप्ति के लिए गोपाल,कृष्ण, राधा या विष्णुसहस्त्र नाम का पाठ तुलसी अर्चन करे
  • भूत प्रेत बाधा निवारण, रक्षा प्राप्ति हेतुसुदर्शन प्रयोग, रामरक्षा, देवीकवच का पाठ करे
  • आकर्षण,सम्मोहन,वशीकरण प्रेम प्राप्ति केलिए तांत्रिक प्रयोग
  • ग्रह पीड़ा अनुसार पूजा,जप करे।

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