रबड़ी बाबा: रबड़ी खिलाकर खुशियां बांटते है यह अनोखे बाबा

उपासना डेस्क,प्रयागराज: 47 वर्षीय नागा साधू आज प्रयागराज कुम्भ में लोगों को रबड़ी खिलाकर उन्हें खुशियां बांटने का कार्य कर रहा है। प्रतिदिन यह नागा साधू 50 लीटर दूध की रबड़ी बनाकर लोगों को खिलाने का कार्य करते हैं। अठारह वर्ष की आयु में संसार सागर की मोह माया से थक हारकर मन में चारधाम यात्रा का संकल्प लेकर उत्तराखण्ड से निकला था।

ऐसा करने के लिए वह अपनी प्रेरणास्रोत मां महाकाली को बताते हैं। उनका कहना है कि इस रबड़ी से असाध्य रोग भी ठीक हो सकते हैं। उनके रबड़ी बांटने के कार्य ने उन्हें रबड़ी बाबा के नाम से देश-विदेश में चर्चित जरुर कर दिया है। जो कुंभ क्षेत्र में आने वाले श्रृद्धालुओं के लिए कौतूहल का विषय बना हुआ है।

यह नागा साधु अपने आप को उत्तर गुजरात के सिद्धपुर पाटन स्थित महाकाली बीड़ शक्तिपीठ से बताते हैं। यूं तो रबड़ी वाले बाबा अपने जन्म स्थल टिहरी गढ़वाल उत्तराखण्ड में कक्षा 6वीं की पढ़ाई ही पूरी कर पाए थे. लेकिन काफी दिनों से गुजरात में निवास करने के चलते वह बढ़िया गुजराती बोल लेते हैं। श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी के दिगम्बर देव गिरि बाबा को अब लोग रबड़ी वाले बाबा के नाम से भी जानते हैं। बाबा का दावा है कि वह प्रतिदिन 50 लीटर दूध को रबड़ी बनाकर कुम्भ में आने वाले श्रद्धालुओं को प्रसाद खिला रहे हैं। इससे पूर्व वह इस रबड़ी का प्रसाद 33 कोटि देवताओं समेत अपने अखाड़े के ईष्ट देव कपिल मुनि को चढ़ाते हैं।

एक महापुरुष ने बदल दिया जीवन
रबड़ी वाले बाबा ने बताया कि वह निकले तो चार धाम यात्रा के लिए थे. लेकिन अभी वह तपोवन तक ही पहुंच पाए थे कि उनकी भेंट एक महापुरुष से हो गई. यह महापुरुष और कोई नहीं बल्कि उनके गुरु पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी के अध्यक्ष नरेन्द्र गिरि जी महाराज थे. उनके मिलने के बाद उनका जीवन ही बदल गया. हालांकि उसके बाद कुछ वर्षों तक उन्होंने संत सेवा की और विभिन्न स्थानों पर रहे भी.

1995 में प्रयागराज में भी बने थे नागा
रबड़ी वाले बाबा बताते हैं कि उनका नागा साधु संस्कार प्रयागराज के 1995 के कुंभ मेला के दौरान ही हुआ था. उसके बाद उनके गुरु ने उन्हें महाकाली की पीठ पर भेज दिया और तब से लेकर अब तक वह वहीं पर सेवा कर रहे हैं.

उज्जैन में था एक अलग स्वरुप
रबड़ी वाले बाबा ने बताया कि इससे पूर्व उनका एक और स्वरुप चर्चा में रह चुका है. वह स्वरुप है नकली गोल्डन बाबा का. उज्जैन कुंभ के दौरान उन्होंने महाकाल के श्रृंगार में प्रयोग होने वाले 5 हजार सिक्कों से अपने शरीर को सजाया था. देखने में वे सिक्के असली सोने के लगते थे. जब वह सिक्के पहनकर दरवाजे के सामने सड़क पर उतरे तो हजारों लोगों की भीड़ उन्हें देखने जुट गई थी. जाम की स्थिति देख स्वयं एसपी को मोर्चा संभालकर उनसे विनय कर वहां से जाने को कहा गया था.

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