पिण्डी रूप में विराजती हैं चन्द्रिका देवी

मां चन्द्रिका देवी मंदिर, कठवारा (बख़्शी का तालाब, लखनऊ) के गर्भ गृह में जगदम्बे की कोई मूर्ति प्रतिष्ठापित नहीं है। यहां भक्तजनों को मातारानी माँ वैष्णो देवी की तरह पिण्डी रूप में दर्शन देती हैं। उनके दाहिने दूसरे मन्दिर में भोलेनाथ भी लिंग स्वरूप में विराजते हैं।
जिस स्थान पर रामायण काल में वीरवर लक्ष्मण के सुपुत्र कुँवर चन्द्रकेतु ने माँ भगवती का आवाहन किया था। उसी स्थान पर नवदुर्गा नौ पिण्डियों के रूप में विराजमान हैं। मन्दिर परिसर में हर अमावस्या को मेला लगता है। साल की दोनों नवरात्र में भी यहां मेला लगता है। बाकी सैकड़ों लोग रोज दर्शन करने आते हैं।
हमारे पुरखों के मुताबिक अयोध्या में राजा रामचन्द्र जी ने अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान किया था। उसी समय कुंवर चन्द्रकेतु उत्तर दिशा में अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा और सेना लेकर बढ़ रहे थे। तभी कठवारा के बाहर गोमती नदी के तट पर एक झील के किनारे जंगल में उस लश्कर ने रात बिताई थी।
कुँवर चन्द्रकेतु ने अमावस्या की घमघोर काली रात में सुरक्षा की दृष्टि से माँ भगवती का आवाहन किया। मातारानी एक ज्योति-पुंज के रूप में नीम के जड़ पर अवतरित हुई। अमावस्या की उस रात में पूरा जंगल चाँदनी रोशनी में जगमग रहा। सुबह उसी स्थान पर पूजा-अर्चना करके चन्द्रकेतु अपनी सेना के साथ उत्तर दिशा में बढ़ गए।
इस बात की जानकारी हमारे पुरखों को हुई। तब वहां पर प्रत्येक अमावस्या को पूजा-पाठ शुरू हुआ। कालांतर में उस जगह एक मठिया बनवाई गई। आसपास के लोगों के सहयोग से हर अमावस्या पर वहां मेला लगने लगा। आज उस स्थान पर भव्य मंदिर है। प्रत्येक अमावस्या को लाखों श्रद्धालु मातारानी के पिण्डी दर्शन पाने आते हैं।

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