आस्था और वैभव की गाथा गाता प्राचीन बाराही मन्दिर सूरजपुर

अनिल कुमार श्रीवास्तव, उपासना डेस्क: तमाम किवदंतियों के बीच आस्था और वैभव की गाथा गाता प्राचीन बाराही मन्दिर जनमानस की श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है।रचनात्मक कार्यक्रमो के माध्यम से श्रद्धालू समय समय पर धार्मिक, सांस्कृतिक विकास के लिए प्रयासरत देखे जाते हैं।

राष्ट्रीय राजधानी से महज 40 किलोमीटर की दूरी पर गौतमबुद्धनगर इलाके के सूरजपुर में स्थित प्राचीन बाराही मन्दिर के विषय मे किवदन्ती है कि त्रेता युग मे रावण का पैतृक गांव पड़ोस में होने की वजह से रावण के दादा यहां पूजा अर्चना किया करते थे और रावण के पिता जी विश्रवा ऋषि ने तप भी किया था, जिससे भगवान भोलेनाथ ने प्रकट होकर उन्हें अपना कुल पुरोहित बनाया था।एक पुरानी मान्यता है भीषण युद्ध का गवाह यह सूरजपुर राजा सूरजमल का राज्य था।युद्ध मे बहे रक्तधारा को लोहिया खाल नाला का नाम मिला।और यह नाला समीप ही है।एक कहावत में शूरवीर आल्हा-ऊदल के शौर्य का भी जिक्र आता है, यह उनकी रणभूमि रही है।

हरियाली की छटा बिखेरते इस मंदिर मे प्रमुख रूप से बाराही देवी, भगवान शिव, भगवान हनुमान की मूर्तियां हैं।मन्दिर प्रांगण में आस्था का केंद्र बना एक प्राचीन बरगद का पेड़ है, जिसकी आभा वटसावित्री वाले दिन देखते ही बनती है।मन्दिर के पास बने सुन्दर, सरम्य सरोवर का अपना खासा महत्व है, कहते हैं कि इस पवित्र सरोवर में स्नान करने से चर्म रोगों में राहत मिलती है।हिन्दू महापर्व छठ में इस सरोवर की महत्त्ता और बढ़ जाती है।श्रद्धालु इसके किनारे घाट बनाकर विधिवत पूजा अर्चना करते है और जलाशय में खड़े होकर सूर्य भगवान को अर्ध्य देते हैं।इसके अलावा मन्दिर पर समय समय पर धार्मिक, सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन कर समितियां आस्था का संचार करती है।

बाराही मेला समिति, शिव मंदिर सेवा समिति व क्षेत्र के श्रद्धालु पारम्परिक रूप से वार्षिक मेले का आयोजन कर सामाजिक, धार्मिक व सांस्कृतिक सन्देश देते हैं।यूँ तो सुबह शाम दर्जनो श्रद्धालू दैनिक पूजा अर्चना में एकत्र होते है लेकिन एकता के सूत्र में पिरो रहे इस मंदिर में धार्मिक अवसरों पर आस्थावानों का उमडा जनसैलाब देखते ही बनता है।

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