उत्तर भारत मे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है नारी आस्था व्रत वट सावित्री पूजन

उपासना डेस्क, अनिल कुमार श्रीवास्तव: पति की दीर्घायु व सन्तान प्राप्ति हेतु फलदायी व्रत वट सावित्री को भारतीय संस्कृति में आदर्श नारीत्व आस्था का प्रतीक माना गया है।वट वृक्ष को समर्पित पूरे विधि विधान से यह पूजा समूचे उत्तर भारत मे हर्षोल्लास के साथ की जाती है।

कथा है कि भद्रदेश के धर्मात्मा राजा अश्वपति को सन्तान न होने से काफी दुखी थे।उन्होंने विशाल यज्ञ से देवी जी को प्रसन्न किया फलस्वरूप एक कन्या सुख प्राप्त हुआ।कन्या का नाम सावित्री रखा।विवाह योग्य होने पर सुखमय दाम्पत्य जीवन के लिए राजा ने साल्व देश के राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान से सावित्री का विवाह कर दिया था।लेकिन दुर्भाग्य के शिकार सत्यवान का राजपाट छिन जाने के कारण सपरिवार दरिद्रता का जीवन काटना पड़ रहा था।जंगल की लकड़ियां काट कर बूढ़े, अंधे माँ बाप से साथ दोनों गुजारा कर रहे थे।हालांकि विवाह के समय नारद जी ने राजा अश्वपति को सत्यवान की अल्पायु के बारे में बता दिया था लेकिन सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रही और विवाह संपन्न हो गया।तयशुदा दिन जंगल मे लकड़ी काटने गया सत्यवान जैसे ही पेड़ पर चढ़ा बेतहासा सिर दर्द के कारण चढ़ा न गया।सावित्री पति का सिर गोद मे रख धैर्य पूर्वक वही बैठ गयी कि अचानक अपने दूतों के साथ प्रकट हुए यमराज सत्यवान की आत्मा को लेकर चलने लगे।सावित्री भी पीछे पीछे चल दी।यमराज के मना करने पर सनातन सत्य का हवाला देते हुए सावित्री ने कहा जहा तक पति जाय वहां तक पत्नी को जाना चाहिए, बात यमराज के दिल को छू गयी और उन्होंने सत्यवान की आत्मा के सिवा कोई वर मांगने को कहा जिस पर बारी बारी से तीन वर मांगे।पहला सास, स्वसुर की नेत्र ज्योति, दूसरा उनका राजपाट और तीसरा सत्यवान के 100 पुत्रों की माँ बन जाऊं।यमराज के तीसरे वरदान पर तथास्तु कहते ही सावित्री ने विनती करते हुए कहा भगवन आपने मुझे माँ बनने का वरदान तो दे दिया परन्तु पति की आत्मा नही दी।विचार कर अचरज में पड़ते हुए मन्द मन्द मुस्काते यमराज ने सत्यवान की आत्मा पाश से मुक्त कर दी।एक चना रूपी प्रसाद दिया जिसे सत्यवान के मुँह में रख सावित्री ने ज्यो ही फूंका सत्यवान जीवित हो उठे।

वट वृक्ष को हिन्दू धर्म मे विशेष स्थान दिया गया है मान्यता है इस वृक्ष के भीतर ब्रम्हा, विष्णु, शिव तीनो देवताओं का वास होता है।इसकी छत्रछाया में व्रतकथा, पूजन, आदि से समस्त इच्छाएं पूरी होती हैं।इस दिन भैंसे पर सवार यमराज की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर उनकी पूजा सावित्री-सत्यवान की कथा सुनी जाती है।सोलह श्रंगार से सजी सुहागन स्त्रियां व्रत वाले दिन सिंदूर, रोली, फूल, अक्षत, चना, फल और मिष्ठान से पूजा कर वट वृक्ष को दूध से सींचती हैं।कच्चे सूती धागे हल्दी से रंग कर वट वृक्ष की परिक्रमा के बाद वट वृक्ष का पत्ता बालो में लगाती हैं।ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह नारी आस्था का पर्व उत्तर भारत के व्रतों में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है।विश्वास के डोर से बंधी नारियां इसकी तैयारी एक सप्ताह पूर्व से ही आरम्भ कर देती हैं।

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